दुनिया के सबसे कम उम्र के सीईओ मात्र 14 वर्ष की उम्र में साइबर कैफे में रखी थी कंपनी की नींव

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आप लोगो ने सुना ही होगा की सपने में बड़ी शक्ति होती है अगर आप का सपना आपकी चाहत बन जाये तो उसे पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता। सपने देखने वाले ही कड़ी मेहनत से अपने सपने पूरे कर सकते हैं। बात उस समय की है जब बेंगलुरु स्थित इंडियन इन्स्टीट्यूट आॅफ साइंस में देश के बड़ी-बड़ी कम्पनियों के सी.ई.ओ. को जब बुलाया गया तो वहाँ एक चमचमाती कार और भी रुकी, जिसमें से निकला एक काम उम्र का लड़का। गेट पर सिक्योरिटी गार्ड ने रोका और कहा — “यह कार्यक्रम बड़े लोगों के लिए है तुम बच्चे हो और इस कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकते। उस बच्चे ने तुरंत मोबाइल निकाला और आयोजकों को फोन किया। आयोजक भागते हुए गेट तक आए और सम्मानपूर्वक इस बच्चे को साथ ले गए। इस कार्यक्रम में बतौर स्पिकर आमंत्रित किया गया यह बच्चा आई.टी. सल्यूशनस कंपनी ग्लोबल्स इंक का प्रेसिडेन्ट 17 वर्षिय सुहास गोपीनाथ था।

सुहास सबसे कम उम्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं उनकी कम्पनी ग्लोबल्स इनकार्पोरेटस अमेरिका के कैलिफोर्निया में रजिस्टर्ड भी है। जिस छोटी से उम्र में किशोर वर्ग के बच्चे मौज मस्ती में जुटे होते हैं वहीं सुहास ने अपनी कंपनी की समृद्धि और विस्तार के लिए प्रयाश किये। वर्ष 2000 में अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर कंपनी की शुरुआत करनेवाले गोपीनाथ प्रतिभावान होने के साथ ही साथ कल्पनाशील भी हैं जो देखे गए सपनो को हकीकत में बदलने के लिए कड़ी मेहनत करते है। जहाँ हिन्दुस्तान में कंपनी रजिस्ट्रेशन के लिए 18 वर्ष का होना अनिवार्य है, वहीं सुहास ने 14 वर्ष की उम्र में 15 मिनट में अमेरिका में कंपनी रजिस्टर कर ली। यह कंपनी अपने ग्राहकों को वेब डिजाईनिंग, आॅनलाईन शाॅपिंग, इन्टेरनेट सुरक्षा और क्रेडिट कार्ड भुगतान जैसी कार्यप्रणाली में मदद करता है। सुहास की कंपनी के प्रतिनिधी बेंगलुरु के आलावा कैलिफोर्निया, न्यूयार्क, मैरिलैंड, वर्जिनिया और लंदन में भी स्थितः हैं।

4 नवम्बर 1986 को एक मध्यमवर्गिय परिवार में जन्में सुहास गोपीनाथ के पिता भारतीय सेना में रक्षा वैज्ञानिक हैं जबकि उनकी माता एक कुशल गृहणी हैं। सुहास की स्कूलिंग बैंगलुरु के एयरफोर्स स्कूल से हुई। प्रारंभ में पशु विज्ञान में रुची रखनेवाले गोपीनाथ जब दोस्तों के साथ कम्प्यूर्टस की बाते करते तो उन्हें लगने लगा उनकी रुचि कम्प्यूटर्स में कहीं अधिक है तथा वो इस छेत्र में कुछ उम्दा कार्य कर सकते है, और उसी लगन को उन्होंने जिवंत कर दिखाया। उस वक्त उनकी परिवारिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन्हें कंप्यूटर सुविधा मुहैया कराई जाए। वह एक साईबर कैफे में जाकर कम्प्यूटर और उसकी कोडिंग सिखने का कार्य करते थे। मगर 15 रुपये की मासिक जेब खर्च साईबर कैफे सर्फिंग के लिए कम पड़ने लगी। तो उन्होनें पहला डिल साईबर कैफे के मालिक से फाईनल की। साईबर कैफे 1 बजे से 4 बजे तक बंद रहता था। सुहास ने फाईनल किया की वह 1 से 4 बजे तक कैफे खोले रहेंगें जिससे कैफे वाले की इनकम भी होगी और बदले में साइबर कैफे वाले उसे फ्री में नेट सर्फिंग करने देगें। सुहास ने फ्रीलांसर वेबसाइट पर खुद को रजिस्टर कर अपना पहला वेबसाईट का आॅडर लिया।

उस समय वह मात्र 13 वर्ष के थे और कक्षा 9वीं के छात्र थे। पहला काम उन्होंने बिना पैसों के किया और फिर कई आकर्षक वेबसाईटस बनाए। उन्होंने 100 डाॅलर उनसे कमाए। उनके पास बैंक अकाउंट नहीं था। जब उन्होंने पिताजी से इस बारे में बात की तो उन्हें उनकी नाराजगी का सामना करना पड़ा परंतु उस वक्त इंजीनियरिंग पढ़ रहे बड़े भाई ने उनकी काफी मदद की। फिर गोपीनाथ ने कई वेबसाईटस बनाए। इसके बाद अपनी काबिलियत दिखाने के लिए कूलहिंदुस्तान डॉट कॉम नामक वेबसाईट बनाई जो NRI पर आधारित थी। फिर उन्हें ढेर सारे वेब डेवलपमेंट के आॅफर आने लगे। उनके पिता ने बड़े भाई के लिए कम्प्यूटर खरीदा। सुहास ने भी इतने पैसे जमा कर लिए थे कि उसने भी अपने लिए एक कम्प्यूटर खरीदा। मगर घर में इनटरनेट कनेक्शन की कमी था।

उन्हें 14 साल की उम्र में अमेरिकी कंपनी नेटवर्क साल्युशनस ने पार्ट टाइम जाॅब आॅफर किया। वह सुहास की पढ़ाई-लिखाई भी स्पांसर करने के लिए तैयार थी। मगर सुहास बिल गेट्स के बारे में पढ़े थे और वैसा ही कुछ अपना करने का सपना देख रहे थे। इसी दौरान दसवीं की प्री-बोर्ड में गणित में फेल कर गए। माँ को स्कूल में बुलाया गया और फिर माँ ने स्पष्ट कहा सिर्फ पढाई और कुछ नहीं और अपने सर पर हाथ रख कर कसम दिलवाई। 4 महीने तक सुहास ने सिर्फ पढाई की और कम्प्यूटर से दूर रहे। उन्होंने प्रथम श्रेणी से दसवीं उत्तीर्ण की। बारवीं के बाद बैंगलूरु के एक इंजीनियरिंग काॅलेज में दाखिला ले लिया। 17 साल की उम्र तक कंपनी के बारे में घर में किसी को नहीं बतया था।

पहले साल ग्लोबल्स इंक का टर्नओवर 1 लाख रहा जो अगले साल 5 लाख तक हो गया। जब सुहास 16 साल के हुए तो उन्होनें महसूस किया की यूरोप में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अधिक अवसर हैं। क्योंकि ज्यादातर भारतीय आई.टी. कम्पनियाँ अमेरिका पर फोकस कर रही थी। जब गोपीनाथ ने स्पेन की कम्पनी को अप्रोच किया तो उन्हें यह कह कर नकार दिया गया कि भारतीयों को स्पैनिश नहीं आती है।

गोपीनाथ ने इसे चैंलेंज के तौर पर लिया और स्पेन के युनिवर्सिटी से हायरिंग की। स्पेन से कुछ प्रोजेक्ट मिलने के बाद उन्होनें इटली में भी वैसा ही प्रयोग किया। अबतक अमेरिकी न्यूज पेपर और बी.बी.सी. ने इनके बारे में काफी कुछ कहा और लिखा था। पर इन सब चकाचौंध से दूर वे सिर्फ अपनी कम्पनी पर फोकस करना चाह रहे थे। उन्होने बाॅन में भी अपनी कम्पनी का आॅफिस स्थापित किया। सुहास जिस दिन 18 साल के हुए उन्होंने भारत में कंपनी रजिस्टर किया और चार लोगों कि हायरिंग की। बैंगलुरु में उन्होंने अाॅफिस उसी साइबर कैफे के बगल में खोला है जहाँ से उन्होंने शुरुआत की थी।

जब वे 17 साल के थे तो पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम से उनकी मिटिंग 15 मिनट के लिए फिक्स हुई जो इतनी गहन थी कि बढ़ कर डेढ़ घण्टे तक चली। जब सुहास अपनी इंजीनियरिंग के 5वें सेमेस्टर में थे तो वर्ल्ड बैंक ने उन्हें बोर्ड आॅफ मेम्बर्स की मीटिंग का न्यौता दिया। वे इस मिटिंग में एकलौते भारतीय थे। सुहास वर्ल्ड बैंक के ICT एडवाईजरी काउंसिल के सदस्य हैं। 2005 में कर्नाटक सरकार ने “राज्योत्व अवार्ड” से सम्मानित किया था। वे वर्ल्ड इकोनाॅमी फोरम के सबसे युवा सदस्य भी हैं। जब गोपीनाथ छोटे थे तो पैसों के बारे में नही सोचते थे। पर अब जब इतनी बड़ी ग्लोबल कंपनी के कर्ताधर्ता हैं तो अपने कर्मचारियों के लिए उन्हें हमेशा सोचना पड़ता है। एक छोटे से साइबर कैफे से शुरु की गई कंपनी आज एक मल्टीनेशनल और मल्टी मिलेनियर कंपनी बन गई है।

जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद, मौज-मस्ती और पढ़ाई-लिखाई पूरी करने की कोशिस में लगे होते हैं उसी उम्र में सुहास गोपीनाथ ने एक सपना देखा और फिर दिन रात एक कर जुट गये उस सपने को पूरा करने में ताकि अपने सपनो को एक आयाम दे सके। घर परिवार, शिक्षा-दीक्षा और अन्य कई बाधाएँ आई पर सबों का कुशलतापूर्वक सामना किया। और आज उनके नाम की कई उपलब्धियाँ है। राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी एक पहचान बन चुकी है। सुहास गोपीनाथ एक ऐसे उदाहरण हैं जिन्होनें मुश्किलों के आगे कभी हार नहीं मानी और उन दुर्गम रास्ते को चुना जिसे कठिन समझकर कई लोगों ने छोड़ दिया था।
इसी लिए कहते है सपने उन पंखो की तरह होते है जो उड़न भरते है लेकिन पुरे उन्ही के होते है जिनके पंखो में जान होती है.

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